मिसरे अटके हुए हैं होठों पर
उड़ते-फिरते हैं तितलियों की तरह लफ़्ज़
काग़ज़ पे बैठते ही नहीं
कब से बैठा हूँ मैं जानम
सादे काग़ज़ पे लिखके नाम तेरा
बस तेरा नाम ही मुकम्मल है
इससे बेहतर भी नज़्म क्या होगी ...










शम्ओं की दुकान बैठे थे...
तक्दीरों में नहीं ...

गला घोंटा है...




सीने में ...

जनून लफ्ज़ सुना जरूर था...

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पर सूरज तन्हा रहता है ...
