नज़्म ...

नज़्म उलझी हुई है सीने में



मिसरे अटके हुए हैं होठों पर


उड़ते-फिरते हैं तितलियों की तरह लफ़्ज़


काग़ज़ पे बैठते ही नहीं


कब से बैठा हूँ मैं जानम


सादे काग़ज़ पे लिखके नाम तेरा



बस तेरा नाम ही मुकम्मल है


इससे बेहतर भी नज़्म क्या होगी ...

आदतें भी अजीब होती हैं ...

साँस लेना भी कैसी आदत है


जिए जाना भी क्या रवायत है





कोई आहट नहीं बदन में कहीं


कोई साया नहीं है आँखों में


पाँव बेहिस हैं, चलते जाते हैं


इक सफ़र है जो बहता रहता है





कितने बरसों से,


कितनी सदियों से


जिये जाते हैं, जिये जाते हैं





आदतें भी अजीब होती हैं ...

महसूस

कुरान हाथों में लेके नाबीना एक नमाज़ी


लबों पे रखता था


दोनों आँखों से चूमता था



झुकाके पेशानी यूँ अक़ीदत से छू रहा था


जो आयतं पढ़ नहीं सका


उन के लम्स महसूस कर रहा हो





मैं हैराँ-हैराँ गुज़र गया था


मैं हैराँ हैराँ ठहर गया हूँ




तुम्हारे हाथों को चूम कर


छू के अपनी आँखों से


आज मैं ने


जो आयतें पड़ नहीं सका


उन के लम्स महसूस कर लिये हैं



आदतन ...

आदतन तुम ने कर दिए वादे

आदतन हम ने ऐतबार किया



तेरी राहों में हर बार रुक कर

हम ने अपना ही इन्तज़ार किया



अब ना माँगेंगे जिंदगी या रब

ये गुनाह हम ने एक बार किया

जुदाई ...

जिस की आँखों में कटी थी सदियाँ


उसने सदियों की जुदाई दी है

किस वतन की तलाश ...

मैं अपने घर में ही अजनबी हो गया हूँ आ कर



मूझे यहाँ देखकर मेरी रूह डर गई है

सहम के सब आरज़ुएँ कोनों में जा छुपी हैं

लवें बुझा दी हैंअपने चेहरों की, हसरतों ने

कि शौक़ पहचानता ही नहीं

मुरादें दहलीज़ ही पे सर रख के मर गई हैं





मैं किस वतन की तलाश में यूँ चला था घर से


कि अपने घर में भी अजनबी हो गया हूँ आ कर

मौत तू एक कविता है...

मौत तू एक कविता है,

मुझसे एक कविता का वादा है


मिलेगी मुझको


डूबती नब्ज़ों में जब दर्द को नींद आने लगे


ज़र्द सा चेहरा लिये जब चांद उफक तक पहुचे





दिन अभी पानी में हो,

रात किनारे के करीब


ना अंधेरा ना उजाला हो,

ना अभी रात ना दिन




जिस्म जब ख़त्म हो


और रूह को जब साँस आऐ






मुझसे एक कविता का वादा है मिलेगी मुझको ...



उसी का इमान बदल गया है

वो ख़त के पुरज़े उड़ा रहा था

हवाओं का रुख़ दिखा रहा था





कुछ और भी हो गया नुमायाँ


मैं अपना लिखा मिटा रहा था




उसी का इमान बदल गया है


कभी जो मेरा ख़ुदा रहा था



वो एक दिन एक अजनबी को


मेरी कहानी सुना रहा था




वो उम्र कम कर रहा था मेरी


मैं साल अपने बढ़ा रहा था



न जाने क्या था...

न जाने क्या था,

जों कहना था

आज मिल के तुझे




तुझे मिला था

मगर, जाने क्या कहा मैंने


वो एक बात जो सोची थी तुझसे कह दूँगा

तुझे मिला तो लगा, वो भी कह चुका हूँ कभी




जाने क्या, ना जाने क्या था

जो कहना था आज मिल के तुझे



कुछ ऐसी बातें जो तुझसे कही नहीं हैं

मगर कुछ ऐसा लगता है तुझसे कभी कही होंगी




तेरे ख़याल से ग़ाफ़िल नहीं हूँ तेरी क़सम

तेरे ख़यालों में कुछ भूल-भूल जाता हूँ



जाने क्या, ना जाने क्या था जो कहना था

आज मिल के तुझे जाने क्या...



चाँद और रोटी ...

मां ने जिस चांद सी दुल्हन की दुआ दी थी मुझे...






आज की रात वह फ़ुटपाथ से देखा मेंने




रात भर रोटी नज़र आया है वो चांद मुझे



जीवन कहाँ खत्म हो जाता ...


जीवन जहाँ खत्म हो जाता




उठते-गिरते,


जीवन-पथ पर चलते-चलते,


पथिक पहुँच कर इस जीवन के चौराहे पर,


क्षणभर रुक कर,


सूनी दृष्टि डाल सम्मुख


जब पीछे अपने नयन घुमाता !




जीवन वहाँ ख़त्म हो जाता !



अंधेरों की खरीददारी...

सब मसरूफ थे




अंधेरों की खरीददारी में ...







हम सजाये हुए








शम्‍ओं की दुकान बैठे थे...


इश्क ...

दोनो का इश्क







कहीं ना कहीं तो जरूर लिखा था...






पर अफ़सोस...




तक्दीरों में नहीं ...

तआरूफ...

ये और बात





कि तआरूफ ना हो सका...






हम ज़िन्दगी के साथ





बहुत दूर तक गए...

रोशनी ...

रोशनी देखने वालों ने

ये कब सोचा है...




कि सुबह ने



कितने सितारों का



गला घोंटा है...

देवता ...

सिर झुकाओगे तो,

पत्थर देवता हो जाएगा...





इतना मत चाहो उसे,

वो बेवफा हो जाएगा...!!!

अब मालूम हुआ...

धूप है क्या और साया क्या है,

अब मालूम हुआ...


ये सब खेल, तमाशादारी,

अब मालूम हुआ...




हँसते फूल का चेहरा देखूं,

पर भर आई आंख...


अपने साथ ये किस्सा क्या है,

अब मालूम हुआ...




हम बरसों के बाद भी उसको,

अब तक भूल ना पाए...


दिल से उसका रिश्ता क्या है,

अब मालूम हुआ...




सहरा - सहरा प्यास में भटके,

सारी उम्र जगे ...


बादल का इक टुकड़ा क्या है,

अब मालूम हुआ...

फैसला...

हमारे रास्तों का फैसला
आसमान के सितारों ने किया था।





पर मेरे तन्हा रहने का फैसला
सितारों ने किया
या अनाज के दानो ने -



- एक ही बात है -





लेकिन इतना जरूर है


कि ये फैसला मैंने नहीं किया...


अपना अपना नसीब...

गरीब लहरों पे


पहरे बिठाये जाते हैं...




और




समुन्द्रों की तलाशी


कोई नहीं लेता...


दिल-ओ-ज़हन ...


दिल

जिस चीज़ को

'हाँ' कहता है ...



जेहन

उसी को

कहता है 'ना'...



इश्क में

'उफ़' ये

खुद ही से लड़ना ...



एक सज़ा है...




सीने में ...

पागलपन ...

खंजर से

हाथों पे लकीरें

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कोई भला
क्या

लिख पाया ...?

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हमने मगर
इक पागलपन में

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खुद को छला है



सीने में...

मेरा गुनाह ...

ज़िन्दगी से बड़ी सज़ा ही नहीं,

और क्या जुर्म है, पता ही नहीं...





इतने हिस्सों में बंट गया हूँ मैं,

मेरे हिस्से में कुछ बचा ही नहीं...!

' जनून '

जनून लफ्ज़ सुना जरूर था...


लेकिन ये नहीं पता था कि भुगतना भी पड़ेगा ...


और वो भी किसी किस्से कहानी की तरह नहीं...


इक ऐसे 'शख्स' के लिए जो मेरा 'खुदा' होगा...


और खुदा भी ऐसा

कि जिसकी अकीदत ही मेरा गुनाह बन जायेगी ...!!!



कभी तुम्हे हार का सामना ना करना पड़े...

जब रूठ ही गए हो,


तो मत आना वापिस ....



कि मुझसे यूं मंजर तेरी शिकस्त का



देखा ना जाएगा ...!!!



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सवेरा...

चाहे लाख बार आये सूरज


मेरे आंगन में...




तुम ना आये,




तो सवेरा नहीं होने वाला ...!!!
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मेरा लिखा ...

सब कुछ हवाओं के हवाले हैं...







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ना कभी तुमने पढ़ा,



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ना ज़िन्दगी ने...







दिल का लगाना ...

दिल भी किसी के साथ लगाया


तो एक बार



मैने कोई भी गुनाह




दोबारा नहीं किया....







सीने में.....


जिस रस्ते पर
तपता सूरज
सारी
रात नहीं ढलता ....




इश्क की ऎसी
राह्गुजर को
हमने चुना है ,



सीने में.....
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इक दिल वालों की बस्ती थी...





इक दिल वालों की बस्ती थी

जहाँ चांद और सूरज रहते थे ...
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कुछ सूरज मन का पागल था

कुछ चांद भी शोख चंचल था ...
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बस्ती बस्ती फिरते थे

हर दम हँसते रहते थे ...
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फिर इक दिन दोनो रूठ गए

और सारे सपने टूट गए ...
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अब चांद भी उस वक़्त आता है

सूरज जब सो जाता है ...
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बादल सब से कहते हैं

सूरज उलझा सा रहता है ...
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चांद के साथ सितारे हैं


पर सूरज तन्हा रहता है ...

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