skip to main
|
skip to sidebar
इक दिल वालों की बस्ती थी...
कभी कभी...
कभी कभी बाजा़र में यूँ भी हो जाता है
कीमत ठीक थी,जेब में इतने दाम नहीं थे
ऐसे ही इक बार मैं तुम को हार आया ...।
0 comments:
Post a Comment
Newer Post
Older Post
Home
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
Feedjit Live Website Statistics
हिन्दी में पूरा लेख पढने के लिए यहाँ क्लीक करें :
http://tannhaa.blogspot.com
कोई दिल के खेल देखे, के मोहबतों की बाजी ... ,
... वो कदम कदम पे जीते, मैं कदम कदम पे हारा....
Turn on speakers...
Before start reading, better it will be to turn on speakers..., perhaps.
Get this widget
|
Track details
|
eSnips Social DNA
काश! ........... इक 'खास' नजर ..............................इन पर भी पड़ती :-
dil ki aawaaj
,
tamanna
,
tumhare liye
पिद्दले बरस ये खौफ़ था...
तुझे खो न दूँ कहीं...
अब के बरस ये दुआ है...
तेरा सामना न हो...!
.
..
..
..
.
.
.
..
.
.
.
आज हार भी कहे, तुझे...जीत...मुबारक...
.
You can read this page in following scripts also :
Punjabi
, Roman
English
बेगुनाह मुजरिम...
अपने हिस्से की धूप को तरसते,
किसी की यादों के दरख्त के साए में
अपने पैर के अंगूठे से दायरे बनाते...
और फिर उन्ही दायरों में उलझ कर रह गए
इक बेगुनाह मुजरिम की दास्ताँ ....
किसी नजर को तेरा इन्तजार आज भी है...
▼
2007
(50)
►
January
(30)
सवेरा...
कभी तुम्हे हार का सामना ना करना पड़े...
' जनून '
मेरा गुनाह ...
पागलपन ...
दिल-ओ-ज़हन ...
अपना अपना नसीब...
फैसला...
अब मालूम हुआ...
देवता ...
रोशनी ...
तआरूफ...
इश्क ...
अंधेरों की खरीददारी...
जीवन कहाँ खत्म हो जाता ...
चाँद और रोटी ...
न जाने क्या था...
उसी का इमान बदल गया है
मौत तू एक कविता है...
किस वतन की तलाश ...
जुदाई ...
आदतन ...
महसूस
आदतें भी अजीब होती हैं ...
नज़्म ...
▼
February
(10)
उन्हीं फ़क़ीरों ने इतिहास बनाया है यहाँ...
आँसुओं से लिखा हुआ ...
इतना मत चाहो उसे, वो बेवफ़ा हो जाएगा
हाथ छूटे भी तो रिश्ते नहीं छोड़ा करते ...
ज़िंदगी यूँ हुई बसर तन्हा
रिश्ता
तमाम सफ़हे किताबों के फड़फडा़ने लगे हवा धकेल के दर...
कभी कभी...
कटी पतंग का मांझा मुहल्ले भर में लुटा...!
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे...!
►
March
(10)
शेल्फ़ से निकली किताब की जगह ख़ाली पड़ी है...
आंखों में लग जाये तो...
दूर हम तुमसे जा नहीं सकते...
रिश्ते...
चाँद-सूरज
जब भी कोई सपना टूटा
अश्क
गिनती ...
शिकवा शिक़ायत
दोस्ती
►
2008
(5)
►
March
(4)
अश्क
फरिश्तों की दुआ
अंदाज़-ऐ-जुदाई
किसी भी लफ्ज़ को दबा कर देखो.........................
►
May
(1)
इक दिल वालों की बस्ती थीजहाँ चांद और सूरज रहते थे ...
आगे क्या लिखा है...?
...अब इन तक्दीरों से पूछने कौन जाये ...???
तकदीर देखूं...
तो इक बूँद नहीं नसीब...!
और प्यास देखूं...
तो समुन्दर की प्यास है...!!!
अब किसने डाली मेरे दर्द पर नजर...
.
.
.
.
.
0 comments:
Post a Comment